भूखे भजन न होय गोपाला - राज्यपाल डाँ. बलराम जाखड़

भूखे भजन न होय गोपाला - राज्यपाल डाँ. बलराम जाखड़

सहजता से भोजन मिलना व्यक्ति का मौलिक अधिकार - जस्टिस धर्माधिकारी अन्न का अधिकार कार्यशाला आयोजित

राज्यपाल डाँ. बलराम जाखड़ ने कहा है कि हमारी पुरानी मान्यता है कि भूखे भजन होय न गोपाला। उन्होंने कहा है कि नागरिकों को स्वस्थ एवं सशक्त रखने के लिए उनकी प्राथमिक जरूरत भोजन की है। डाँ. जाखड़ ने ये विचार आज यहां अन्न का अधिकार विषय पर आयोजित एक दिवसीय कार्यशाला में व्यक्त किये। कार्यशाला का आयोजन म.प्र. मानव अधिकार आयोग तथा प्रशासन अकादमी द्वारा संयुक्त रूप से किया गया। इस अवसर पर आयोग के अध्यक्ष जस्टिस श्री डी.एम.धर्माधिकारी ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को सहजता से भोजन मिल सके, यह उसका मौलिक अधिकार है। कार्यशाला में आयोग के सदस्यद्वय जस्टिस श्री नारायण सिंह आजाद और श्री विजय शुक्ल, अकादमी की महानिदेशक श्रीमती माला श्रीवास्तव तथा म.प्र. उपभोक्ता प्रतितोषण फोरम के अध्यक्ष जस्टिस श्री एन.के. जैन मुख्य रूप से उपस्थित थे।

राज्यपाल ने कहा कि अन्न की उपलब्धता को सरकारी योजना से ऊपर उठकर व्यक्ति के मौलिक अधिकारों के साथ जोड़कर सोचने का जो विचार बना है यह स्वागत योग्य है। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक और उन्नत कृषि तकनीक अपनाकर उत्पादन बढ़ाने से सभी को पर्याप्त भोजन मिल सकता है लेकिन बढ़ती हुई आबादी से स्थिति जस की तस हो जाती है। राज्यपाल ने कहा कि आबादी नियंत्रण के लिए दृढ़ इच्छा शक्ति की जरूरत है। राज्यपाल ने चिन्ता प्रकट की कि कृषि जोत के छोटे होते आकार से किसान परेशानी में आ गया है। किसान आज इतनी उपज भी नहीं ले पा रहा है कि वह अपने परिवार की जरूरतों को ही पूरा कर सके। डाँ. जाखड़ ने कहा कि खेती किसानी के सहायक व नैसर्गिक संसाधनों जैसे जल और जंगल को बचाने की आज बड़ी जरूरत है। अन्य स्थिति में भावी पीढ़ियों को अपने लिये भोजन जुटाना कठिन कार्य हो जाएगा। उन्होंने कहा कि भूमि का कृषि के अलावा अन्य प्रयोजनों के लिये उपयोग सीमित होना चाहिये इस मसले पर कृषि के क्षेत्र में कार्यरत संस्थाओं तथा सरकार को समन्वित रूप से विचार कर कोई समाधान पूर्वक हल निकालना होगा। उन्होंने कहा कि कृषि आधारित उद्योगों की बड़े पैमाने पर स्थापना होनी चाहिये। इससे किसान को उसकी उपज का वाजिब दाम मिलेगा तथा लोगों को रोजगार के अवसर सुलभ होंगे।

जस्टिस धर्माधिकारी ने कहा कि मनुष्य की क्षुध्दा तृप्ति के लिये सबको अन्न मिलना जरूरी है। संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों में जीवन के अधिकार में ही सभी को अन्न मिले इसका विशेष उल्लेख है। उन्होंने कहा कि देश में खाद्यान्नों के पर्याप्त भंडार उपलब्ध हैं लेकिन नाकाफी पहुंच मार्गों तथा परिवहन सुविधाओं के कारण सुदूरवर्ती बसाहटों में रहने वाले लोगों तक अभी भी पर्याप्त मात्रा में खाद्यान्न उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। जस्टिस धर्माधिकारी ने कहा कि माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा इन विषम परिस्थितियों का सतत् मानिटरिंग भी किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि सरकार की यह जिम्मेदारी है कि खाद्यान्न की आपूर्ति समाज की अंतिम पंक्ति के अंतिम व्यक्ति तक हो। श्री धर्माधिकारी ने कहा कि व्यक्ति को अन्न की उपलब्धता मेहरबानी की तरह नहीं बल्कि उसके अधिकार के रूप में होनी चाहिए।

राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के निर्देशक श्री संजय दुबे ने कहा कि देश के नीति निर्देशक तत्वों में यह स्पष्ट उल्लेख है कि विधायिका और न्यायपालिका इस ओर ध्यान दे की सभी को खाद्यान्न मिल रहा है कि नहीं। उन्होंने कहा कि यह दुर्भाग्य है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली की कमी के कारण देश में पर्याप्त अन्न भंडार होने के बावजूद भी जीरो हंगर की स्थिति नहीं बन पा रही है तथा अन्न की सुलभता मूल प्रश्न बना हुआ है। उन्होंने कहा कि सबके लिये स्वास्थ्य की समस्या भी अन्न की समस्या के साथ जुड़ी हुई है। डॉ. दुबे ने कहा कि किसानों में अपने पुश्तैनी व्यवसाय की प्रति उदासीनता का भाव चिन्ता का विषय है। फौज से जवान भी पलायन कर रहे हैं, ये दोनों स्थितियां राष्ट्रहित में नहीं हैं। समाज और सरकार को इन दोनों वर्गों की स्थितियों को सुधारने के प्रयत्न करने होंगे।

कार्यक्रम के अंत में आभार प्रदर्शन, आयोग के सदस्य जस्टिस नारायण सिंह आजाद ने किया। इस अवसर पर प्रमुख सचिव डाँ. ए.एन. अस्थाना, भोपाल की जिला एवं सत्र न्यायाधीश श्रीमती रेणु शर्मा, आयोग के उप सचिव श्री विजयचन्द्र, यूनिसेफ तथा स्वयंसेवी संगठनों के पदाधिकारी, विधि छात्र और प्रचार माध्यमों के प्रतिनिधि बड़ी संख्या में उपस्थित थे।

 

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