सबको घर मुहैया कराने के लिये आवास एवं पर्यावास नीति-2007 का अनुमोदन

सबको घर मुहैया कराने के लिये आवास एवं पर्यावास नीति-2007 का अनुमोदन

राज्य मंत्रिपरिषद ने आज संपन्न हुई बैठक में प्रदेश के सभी वाशिंदों को उनका अपना घर मुहैया कराने के उद्देश्य से राज्य की ''आवास एवं पर्यावास नीति-2007'' का अनुमोदन किया। राज्य के वेघरों के लिए आवास मुहैया कराने के लिए प्रदेश शासन द्वारा वर्ष 1995 में आवास नीति लागू की गई थी। किराया आवास निर्माण के लिए प्रोत्साहन में कमी तथा कठोर भाड़ा नियंत्रण अधिनियम के चलते शहरी क्षेत्र में आवास की आपूर्ति की समस्या का आकार और अधिक बढ़ गया था। हालांकि आर्थिक उदारीकरण के चलते निजी और कार्पोरेट सेक्टर ने बड़े पैमाने पर आवास एवं टाउनशिप निर्माण के लिए पूंजी निवेश किया है लेकिन तीव्र रहे शहरीकरण एवं शहरी जनसंख्या में हो रही आशातीत वृध्दि के कारण समस्या के हल के लिए कदम उठाने की आवश्यकता को देखते हुए आवास नीति 1995 में संशोधन एवं परिवर्ध्दन की आवश्यकता महसूस की गई।

§                     निजी और कार्पोरेट सेक्टर की भागीदारी का प्रावधान

§                     निर्माण एजेन्सियों को रियायती दर पर शासकीय भूमि उपलब्ध कराई जायेगी

§                     प्रत्येक जिले के एक आवास कार्य योजना बनाई जायेगी

§                     प्रत्येक गांव के सुव्यवस्थित विकास के लिये मास्टर प्लान

§                     ग्रामीण क्षेत्रों के लिये आवास गृहों का वार्षिक लक्ष्य निर्धारण

§                     बड़े शहरों की 30 किलोमीटर की परिधि में टाउनशिप निर्माण के लिये उपलब्ध शासकीय भूमि दी जायेगी

§                     निजी जनसहभागीदारी को प्रोत्सान

§                     कृषि परिक्षेत्र में भू उपयोग परिवर्तन की अनिवार्यता समाप्त

§                     अचल संपत्ति विकास अधिनियम बनेगा

§                     मध्यप्रदेश शहरी अधोसंरचना कोष का निर्माण

वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार प्रदेश की कुल जनसंख्या 603.48 लाख है, जिसमें से 26.67 प्रतिशत जनसंख्या शहरी क्षेत्र में निवासरत है। पिछले दशक में नगरीय जनसंख्या में 31.19 प्रतिशत वृध्दि हुई है, जो संपूर्ण भारत में नगरीय क्षेत्र की जनसंख्या वृध्दि 31.13 प्रतिशत से अधिक है। वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार प्रदेश में 14 लाख आवासों की कमी पायी गयी, जिसमें लगभग 8 लाख आवासों की कमी केवल ग्रामीण क्षेत्र में ही है। बी.पी.एल. सर्वे तथा अन्य प्राथमिक सर्वे के आधार पर वर्ष 2007 में आवासों की कमी लगभग 17 लाख का आंकलन है, जिसमें 10 लाख आवासों की कमी ग्रामीण क्षेत्रों में है।

आवास एवं पर्यावास नीति-2007 में प्रमुख तौर पर सामाजिक आवास की आपूर्ति की आवर्ध्दन एवं निरन्तरता बनाये रखने के लिए निजी और कार्पोरेट सेक्टर की भागीदारी का प्रावधान किया गया है। बड़े शहरों में आबादी के दबाव को कम करने के लिए शहरों के 30 कि.मी. की परिधि में कम ऊँचाई और कम घनत्व की बसाहटों का विकास करने के लिए शासकीय भूमि निर्माण एजेन्सियों को रियायती दर पर सुलभ कराने प्रावधान किया गया है। किराये पर देने के लिये मकान के निर्माण को प्रोत्साहन करने, आश्रय शुल्क के विकल्प को या तो पूर्णत: समाप्त करने या फिर उसे कठोर बनाते हुए सामाजिक आवास की आपूर्ति में वृध्दि करने की पहल भी की गई है। साथ ही बाहय विकास राशि में युक्तियुक्त वृध्दि करते हुए एवं शहरी अधोसंरचना कोष का निर्माण करते हुए तंग बस्तियों के सुधार के लिए प्रावधान किया गया है।

कृषि परिक्षेत्र में भूमि उपयोग परिवर्तन की अनिवार्यता को समाप्त करते हुए टाउनशिप निर्माण की अनुमति देने तथा कालोनियों के निर्माण के लिए न्यूनतम आवश्यक भूमि का निर्धारण करते हुए अवैध एवं अव्यवस्थित कालोनी निर्माण की मनोवृत्ति पर अंकुश लगाने का प्रावधान भी शामिल किया गया है। रियल एस्टेट सेक्टर में भ्रामक विज्ञापनों के द्वारा निम्न स्तरीय विकास एवं निर्माण की पनपती हुई गतिविधियों को प्रभावी रूप से नियंत्रित करने के लिए रियल एस्टेट डेवलपमेंट एक्ट बनाये जाने की प्रतिबध्दता को दोहराया गया है।

आवास एवं पर्यावास नीति-2007 के प्रमुख प्रावधान अनुसार प्रत्येक जिले के लिये आवास कार्ययोजना बनाई जायेगी, जिसमें शहरी तथा ग्रामीण क्षेत्रों की आवासीय मांग तथा भावी योजनाओं को शामिल किया जायेगा। गांव से शहरों की ओर पलायन तथा शहरों में तंगबस्तियों के निर्माण की समस्या के निदान के लिये ग्रामीण विकास केन्द्रों का विकास किया जायेगा तथा प्रत्येक गांव का सुव्यवस्थित एवं एकीकृत विकास करने के लिये मास्टर प्लान बनाया जायेगा। नीति में इस बात पर विशेष ध्यान दिया गया है कि ग्रामीण परिवेश को अक्षुण्ण रखते हुये गांव का विकास किया जाये। ग्रामीण क्षेत्र में रहने के अयोग्य मकानों को उन्नयन करने, ग्रामीण बेघरों, अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजातियों तथा अन्य पिछड़ा वर्ग तथा अन्य कमजोर वर्गों को आवास मुहैया कराने के लिए वार्षिक लक्ष्य निर्धारित किया जावेगा एवं आवश्यकता पड़ने पर राज्य के बजट में भूमि आपूर्ति के लिए प्रावधान किया जायेगा। प्रदेश के नगरों की विकास योजनाएं सस्टेनेबल डेवलपमेन्ट के आधार पर तैयार होंगी और शहरी स्थानीय निकायों को विकास योजनाएं बनाने हेतु चरणों में कार्य सौंपा जायेगा।

सामाजिक आवास की निरंतर पूर्ति सुनिश्चित करने हेतु सार्वजनिक संस्थाओं को शहरी क्षेत्रों में शासकीय भूमि रियायती दर पर उपलब्ध कराई जायेगी। प्रमुख शहरों के निकट युक्तियुक्त मूल्यपर कम ऊंचाई#घनत्व की आवासीय कालोनियां विकसित करने हेतु 30 कि.मी. की परिधि में उपलब्ध शासकीय भूमि निर्माण संस्थाओं को टाउनशिप निर्माण हेतु उपलब्ध कराई जायेगी, ताकि सस्ते आवासों का निर्माण सुलभ हो सके। विकास योजना में प्रस्तावित मुख्य मार्गों के निर्माण की पूर्ति, मार्ग के दोनों ओर अतिरिक्त भूमि के अधिग्रहण तथा विक्रय द्वारा की जावेगी। नगर तथा परिक्षेत्रिक स्तर के अधोसंरचना विकास पर होने वाले व्यय की पूर्ति विकासकर्ताओं से बाहय विकास राशि प्राप्त कर की जावेगी। नगर विकास स्कीम#गृह निर्माण स्कीम हेतु भूमि के निश्चित क्षेत्र की आवश्यकता प्रतिपादित है। इन्दौर एवं भोपाल नगर निगम क्षेत्र में 40 से 50 हेक्टेयर, जबलपुर, ग्वालियर, उज्जैन एवं सागर नगर निगम क्षेत्र में 25 से 40 हेक्टेयर, शेष नगर पालिक निगमों के क्षेत्र में 15 से 25 हेक्टेयर तथा अन्य नगर पालिकाएं#नगर पंचायतों के क्षेत्र में 10 से 15 हेक्टेयर, की न्यूनतम भूमि की आवश्यकता होगी।

अव्यवस्थित एवं अवैध कालोनियों के निर्माण को रोकने तथा कालोनियों में सामुदायिक अधोसंरचना को सुनिश्चित करने के लिए कालोनी निर्माण के न्यूनतम मापदण्ड इन्दौर, भोपाल में 8 हेक्टेयर, जबलपुर, ग्वालियर, उज्जैन एवं सागर में 6 हेक्टेयर शेष नगर पालिक निगमों में 4 हेक्टेयर एवं अन्य नगर पालिकाओं और नगर पंचायतों में 2 हेक्टेयर निर्धारित किये गये हैं। इसी तरह समूह आवास हेतु इन्दौर भोपाल में 2 हेक्टेयर, जबलपुर, ग्वालियर, उज्जैन एवं सागर में 1.50 हेक्टेयर, शेष नगर पालिक निगम में 1 हेक्टेयर एवं अन्य नगर पालिकाओं और नगर पंचायतों 0.5 हेक्टेयर, न्यूनतम भूमि निर्धारित की गई है। निजी भूमि के अधिग्रहण के मामले में भू-स्वामियों को योजना में स्टेक होल्डर या भागीदार बनाया जायेगा। भूमि स्वामी के विकल्प पर भूमि के मुआवजा के बदले उनसे प्राप्त कुल भूमि से उपलब्ध हुए विकसित क्षेत्र की 20 प्रतिशत भूमि, भूमि स्वामियों को उपलब्ध कराई जायेगी। पुनर्घनत्वीकरण योजना के माध्यम से राज्य के प्रमुख शहरों की कोर एरिया में अधोसंरचना के दबाव को कम किया जावेगा।

प्रदेश में आवास गृहों की कमी की पूर्ति के लिये निजी जनसहभागीदारी को प्रोत्साहित किया जायेगा और इसके लिये नीति में प्रावधान किया गया है कि कृषि परिक्षेत्र में भू उपयोग परिवर्तन की अनिवार्यता को समाप्त करते हुये टाउनशिप निर्माण की अनुमति दी जायेगी। देश तथा विदेश के प्रत्यक्ष पूंजीनिवेश को शासन द्वारा प्रोत्साहित किया जायेगा। साथ ही उपभोक्ताओं के हितों का संरक्षण करने के लिये अचल संपत्ति विकास अधिनियम बनाया जायेगा। गृह निर्माण सहकारी समितियों के सदस्यों के हित संरक्षण#संवर्धन के लिये समुचित प्रयास किये जायेंगे। आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिये सामाजिक आवास के आवंटन की प्रक्रिया को सरल किया जायेगा। निम्न आय वर्ग हेतु निर्धारित आय सीमा आयकर विभाग द्वारा निर्धारित कर मुक्त आय सीमा तक तथा आर्थिक रूप से कमजोर आयवर्ग हेतु आय सीमा कर मुक्त आय सीमा की एक तिहाई तक मानी जायेगी। रियायती दरों पर शासकीय भूमि प्राप्त होने पर नगर विकास स्कीम#गृह निर्माण स्कीम में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग#निम्न आय वर्ग हेतु 30 प्रतिशत के बराबर क्षेत्र सुरक्षित किया जावेगा। निजी तथा सहकारी क्षेत्र की कालोनियों में इसे 15 प्रतिशत रखा गया है। निर्धारित प्रतिशत से अधिक भवनों की आपूर्ति को प्रोत्साहित करने हेतु निजी#सहकारी क्षेत्र को अधिक फर्शी क्षेत्र दिया जावेगा। रोजगार की तलाश में छोटे कस्बों से नगरों की ओर आने वाले व्यक्तियों के लिए ट्रान्ज़िट आश्रय की व्यवस्था की जावेगी।

पारदर्शिता की दृष्टि से शहरी स्थानीय निकाय द्वारा सूची प्रकाशित कर अवगत कराया जावेगा कि कौन-सी बस्तियों को उन्नयन कर स्थायी किया जावेगा तथा किन बस्तियों को अन्यत्र व्यवस्थापित किया जावेगा। बहुमूल्य भूमि पर स्थापित बस्तियों को स्थल के आसपास प्रकोष्ठों में पुर्नवास हेतु निजी#कार्पोरेट सेक्टर को यथाशीघ्र सम्बध्द किया जावेगा।

प्रदूषण रहित औद्योगिक इकाईयों, जिसमें कार्यरत श्रमिकों की संख्या 200 से अधिक हो, को श्रमिकों के आवास हेतु यथासंभव अपने परिसर में ही व्यवस्था करनी होगी। शासन द्वारा रियायती दर पर भूमि उपलब्ध कराने पर मध्यप्रदेश गृह निर्माण मण्डल द्वारा भी श्रमिकों के लिए आवासगृहों का निर्माण कराये जाने का प्रावधान रखा गया है। मकान मालिकों व किरायेदारों के हित में संतुलन बनाते हुए, भाड़ा नियंत्रण कानून में संशोधन किया जायेगा। केवल किराये की दृष्टि से आवास निर्माण के लिये निजी तथा कार्पोरेट सेक्टर को प्रोत्साहित किया जावेगा। गृह निर्माण मण्डल एवं विकास प्राधिकरण द्वारा निर्मित सम्पत्तियों के पंजीयन के मामले में समाज के उपेक्षित वर्ग, निशक्तजन, विधवा महिलायें, अनाथ एवं उपेक्षित वरिष्ठ नागरिक जनों को पंजीयन शुल्क में एक प्रतिशत की अतिरिक्त छूट दी जायेगी। सम्पत्ति कर के स्वनिर्धारण हेतु इसे और सरल बनाया जावेगा।

भवन निर्माण के क्षेत्र में गैर पारम्परिक सामग्री के उपयोग तथा नई तकनीक को लोकप्रिय बनाने हेतु सार्वजनिक तथा निजी निर्माण केन्द्रों की स्थापना कर प्रशिक्षण की सुविधा उपलब्ध कराई जावेगी। तकनीकी कर्मचारियों को उनकी कार्यक्षमता एवं तकनीकी ज्ञान में वृध्दि हेतु भी प्रशिक्षणों के आयोजन की व्यवस्था होगी।

शहरी अधोसंरचना विकास हेतु मध्यप्रदेश शहरी अधोसंरचना कोष बनाया जावेगा। आवास एवं अधोसरंचना विकास के क्षेत्र में संस्थागत वित्त एवं निजी वित्तीय स्रोतों को आकर्षित करने हेतु डेवलपमेंट बॉण्ड जारी करने की अनुमति देने पर विचार किया जावेगा।

 

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