तो हो ही जाये एक अदद डकैत पंचायत, तय हो जाये डकैत नीति

व्‍यंग्‍य

तो हो ही जाये एक अदद डकैत पंचायत, तय हो जाये डकैत नीति

नरेन्‍द्र सिंह तोमर 'आनन्‍द'

अपनी मध्‍यप्रदेश सरकार पंचायत सरकार

कौन कहे कि मध्‍यप्रदेश में पंचायती राज नहीं है, भले ही पंचायत प्रणाली चाहे त्रिस्‍तरीय हो या पंचम स्‍तरीय बोर्ड परीक्षा वाली भले ही ठप्‍प ठपा ठप ठप्‍प हो गयी है लेकिन पंचायती राज तो मध्‍यप्रदेश में चल रहा ही है, सी.एम. ने जितनी पंचायतें गये साल और चालू साल में निबटाईं हैं उतनी भारत की आजादी से लेकर अब तक नहीं निबटी होंगीं । कन्‍छेदी दादा और मन्‍नू लोहार की पंचायत से लेकर दलित पिछड़ वर्ग तक की पंचायत सी.एम. हाउस में हो चुकी है, कुल जमा कितनी पंचायते बैठ चुकीं और उनके रिजल्‍टस क्‍या आये, भईया अपन को नहीं मालुम लेकिन इत्‍ता जरूर पता है कि खूब सारी हो चुकीं हैं और सरकार में कोई काम आजकल बगैर पंचायत किये हो ही नहीं रहा । ले बेटा अब कैसे कहोगे कि प्रदेश में पंचायती राज नहीं है ।

पहले केवल किसी जमाने में अकेली केबिनेट पंचायत हुआ करती थी अब मन्‍नू लोहार और कन्‍छेदी दादा की पंचायत होती है । गोया मन्‍नू लोहार और कन्‍छेदी दादा सी.एम. के पुराने टायटल हैं सो हर भाषण प्रवचन में इनका नाम आना जरूरी है वरना सी. एम. को लगता ही नहीं कि भाषण हुआ या समाचार छपा । अपना जनसम्‍पर्क संचालनालय सी.एम. पर खासा मेहरबान है कभी कभी सी.एम. जब भाजपा की निजी पार्टी बैठक में भी कन्‍छेदी दादा और मन्‍नू लोहार बोल बैठते हैं तो पार्टी के निजी समाचार भी विभाग से बाकायदा सरकारी नंबर से रिलीज हो जाते हैं । शायद विभाग के सर्च इंजिन में सी.एम. या शिवराज फिट है जो भी कहीं भी बोले निजी या सरकारी, विभाग को रिलीज मारनी ही हैं ।

देखना भईया संचालनालय वालो अंधी भक्ति कबहूं कबहूं बड़ी गहरी चोट देती है सो 'कहीं ऐसा न हो लग जाये दिल में आग पानी से' कहीं सर्च फीड के चक्‍कर में पर्सनल बाथरूमिया रिलीज मत मार देना ।

डकैत पंचायत कब

सी.एम. की पंचायत में डकैतों की पंचायत का नंबर कब आयेगा, इसे लेकर चम्‍बल के डकैत खासे चिन्तित हैं, वे भी चाहते हैं कि कोई नीति बने तो पहले उनसे राय मशविरा हो । कोई तो फिक्‍सड आकलित नीति हो, चम्‍बल के डकैत इस बारे में पहिले क्‍लासिफेकेशन यानि वर्गीकरण चाहते हैं, आखिर जैसे पुलिस में रैंक आलाटमेण्‍ट सिस्‍टम है डकैतों में भी होना चाहिये और सरकार द्वारा घोषित की जाने वाली इनाम इकराम भी डकैतों के रैंक स्‍टेटस के अनुसार ही होना चाहिये इसके अलावा कम से कम छ: माह पहले घोषित इनामो इकराम ही वैध मान्‍य होना चाहिये अभी तो ये हो रहा है कि पहले डकैत पकड़ या मार लिया जाता है और उसके बाद इनाम इकराम बढ़ा बढ़ू कर उसे बाद में पकड़ा या मारा घोषित किया जाता है, अब भई ये तो डकैत पंचायत में ही तय हो सकेगा कि डकैतों के अधिकारों का उल्‍लंघन हो रहा है कि नहीं ।

चम्‍बल में एक और रिवाज है जैसे डकैत कह देते हैं कि मार देंगें, ठोक देंगें, जिन्‍दा नहीं रहने देंगें वगैरह वगैरह अब चम्‍बल की पुलिस भी इसी भाषा में बोलती है कि छोड़ेगे नहीं, आत्‍मसमर्पण नहीं करने देंगें, मार देंगें, ठोक देंगें वगैरह वगैरह गोया खाकी वर्दी किसी को पकड़ कर कानून के हवाले करने के लिये नहीं बल्कि हरेक को ठोक देने, मार देने के लिये पहनाई गई है, और मारने का उन्‍हें जन्‍मसिद्ध अधिकार मिल गया है । अब डकैत वर्दी वाले और बिना वर्दी वाले, जंगल बीहड़ वाले और सरकारी बंगलो वाले इनमें कोई फर्क तो कम से कम होना ही चाहिये अब भई ये फैसला तो डकैत पंचायत में ही हो सकेगा न ।

डकैतों को एक और नीति पर बात करनी है कि पुलिस किसी भी छिछोरे, चोर उचक्‍कों को डकैत कह देती है और इनामो इकराम के लिये ठोक देती है, आखिर यह तो तय होना ही चाहिये न कि डकैती आखिर कहॉं डाली और कितनी डाली, पुलिस तो चार आदमी से ज्‍यादा कहीं से भी पकड़ कर एक समाचार छपवा देती है कि 'डकैती की योजना बनाते पॉंच पकड़े' । अब भई पुलिस की डेफीनेशन में वे भी डकैत हैं चाहे कहीं डकैती नहीं ठोकी हो, और योजना बनाने का क्‍या कोई सबूत कभी होता है ।

डकैत मानव होते हैं कि नहीं, उनके मानव अधिकार होते हैं कि नहीं ये प्‍वाइण्‍ट भी डिस्‍कस होना है, फिलवक्‍त मुरैना की अदालत तो मानव अधिकार को मानती नहीं, जेल में किसी की पिटाई हुयी वह गंभीर रूप से घायल होकर अस्‍पताल में पहुंचा और मर गया या जेल ही मर गया, गोया अदालत को समझ ही नहीं आया कि कौनसा मानव अधिकार उल्‍लंघन हुआ ।

सो भईया शिवराज पंचायतों के इस अदद मौसम में लगे हाथ एक डकैत पंचायत बुलवा डालो, पाप्‍युलर भी हो जाओगे और डकैत चुनाव में काम भी आयेंगे ।                           

 

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