'बुंदेलखंड के वीरप्पन' को मंहगा पड़ा राजनैतिक दल-बदल

'बुंदेलखंड के वीरप्पन' को मंहगा पड़ा राजनैतिक दल-बदल

 निर्मल रानी

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       उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश के सीमावर्ती ंजिलों में गत् 30 वर्षों से आतंक का पर्याय बना शिव कुमार पटेल उंर्फ ददुआ डकैत गत् 22 जुलाई रविवार को प्रात: उत्तर प्रदेश पुलिस की विशेष टास्क ंफोर्स के साथ चली दो दिन की मुठभेड़ में मारा गया। यह मुठभेड़ चित्रकूट जिले के मारकुंडी के जंगलों में थाना मानिकपुर के अन्तर्गत हुई। इस डकैत पर उत्तर प्रदेश पुलिस ने 5 लाख रुपए का ईनाम घोषित कर रखा था जबकि मध्य प्रदेश सरकार द्वारा भी इस पर 1 लाख रुपए का ईनाम रखा गया था। ददुआ पर हत्या, डकैती व अपहरण जैसे गंभीर अपराधों के अन्तर्गत 225 से अधिक मुंकद्दमे चल रहे थे। ददुआ से मुठभेड़ करने वाली पुलिस टीम के सभी सदस्यों को उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा पदोन्नति देने के साथ-साथ एक लाख रुपए की नंकद इनाम राशि देने की भी घोषणा की गई है। ददुआ गिरोह के साथ चली इस पुलिस मुठभेड़ में ददुआ के 11 साथी भी मारे गए।

              वैसे तो भारतवर्ष में सैकड़ों प्रसिद्धि प्राप्त ऐसे डाकू पहले भी हो चुके हैं जो अपने आतंक के साथ-साथ राजनीति के क्षेत्र में दंखलअन्दांजी करने के लिए भी प्रसिद्ध रहे हैं। अनेकों डाकुओं व गैंगस्टरों ने तो राजनीति को कवच के रूप में इस्तेमाल करने का काम किया है। आज भी राजनीति में अनेकों ऐसे लोग सक्रिय देखे जा सकते हैं जो भले ही डाकू न हों परन्तु एक अपराधी गिरोह का सरगना होने के नाते उनके अपने क्षेत्रों में उनकी दहशत किसी बड़े डाकू की दहशत से कम नहीं है। दुर्भाग्यवश विभिन्न राजनैतिक दलों के टिकट पर अथवा अपने व्यक्तिगत बाहुबल पर चुनाव जीतकर यह लोग आज हमारे देश की लोकसभा व कई विधानसभाओं को कलंकित कर रहे हैं। किसी न किसी कारणवश राजनैतिक दल-बदल तो देश के तमाम नेता करते ही रहते हैं। परन्तु एक पेशेवर अपराधी के दल-बदल का मंकसद सत्ता या सिद्धान्त अथवा टिकट आदि देने दिलाने जैसी बातें न होकर केवल एक ही होती है कि आंखिर उसके जीवन की गारंटी किस राजनैतिक दल की छत्रछाया में सुनिश्चित है। अपने इसी लक्ष्य के तहत आमतौर पर अपराधी लोग एक राजनैतिक दल का दामन छोड़कर दूसरे राजनैतिक दल का दामन थामने की प्रक्रिया में लगे रहते हैं।

              आज उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती की पुलिस ने बड़ी मशक्कत कर ददुआ को मार गिराने में सफलता हासिल कर ली है। उत्तर प्रदेश की पुलिस ने मायावती के सत्ता में आते ही ददुआ को मारने हेतु चित्रकूट व मानिकपुर के जंगलों में विशेष अभियान चला रखा था। उत्तर प्रदेश पुलिस का कहना है कि मुख्यमंत्री ने उत्तर प्रदेश से अपराधियों का संफाया किए जाने का ऐलान कर रखा है। इस मुठभेड़ पर रौशनी डालते हुए उत्तर प्रदेश के डी जी पी ने कहा कि चूंकि मुख्यमंत्री मायावती ने पुलिस तंत्र को मुक्त रूप से कार्य करने की छूट दी हुई है, इसी वजह से ददुआ गिरोह को समाप्त करने में सफलता मिली है। प्रश् यह है कि ददुआ ही सबसे पहले क्यों बना मायावती की पुलिस का निशाना?

              ददुआ के अपराधिक जीवन के साथ-साथ यदि उसकी राजनैतिक पृष्ठभूमि पर भी नंजर डाली जाए तो मिलेगा कि ददुआ ने अपनी जान बचाने के लिए स्थानीय स्तर पर कई राजनैतिक दलों का संरक्षण प्राप्त किया हुआ था। परन्तु लगभग एक दशक तक वह बहुजन समाज पार्टी के पक्ष में ही वोट मांगता रहा। ददुआ से प्रभावित क्षेत्रों में उसके नाम से पर्चे बांटे जाते थे तथा पोस्टर छपवाए जाते थे जिसमें बांकायदा ददुआ की अपील छपी होती थी। कई बार चेतावनी भरे वाक्य प्रकाशित कर ददुआ लोगों से वोट देने की अपील करता था। ऐसे ही एक पोस्टर में बहुजन समाज पार्टी के पक्ष में ददुआ ने इन शब्दों में वोट मांगा था- मोहर लगेगी हाथी पर- नहीं तो गोली छाती पर- लाश मिलेगी  घाटी पर। उपरोक्त वाक्यों से ददुआ की बहुजन समाज पार्टी के प्रति समर्पित वंफादारी के साथ-साथ उसके घोर आतंक की झलक भी सांफ दिखाई देती है। परन्तु इसके बावजूद उसी ददुआ को बहुजन समाज पार्टी की सरकार ने गोलियों से छलनी कर डाला। क्या था ददुआ का ंकुसूर? यदि दुर्दान्त डकैत होना ही उसका अपराध था तो वह तो गत् 30 वर्षों से आतंक का प्रतीक बना घूम रहा था। 1975 में पहली बार ददुआ हत्या के एक जुर्म में उत्तर प्रदेश पुलिस के हत्थे चढ़ा था। परन्तु वह पुलिस हिरासत से भाग निकला था। तब से लेकर उसके मारे जाने तक पुलिस ददुआ का कोई सुरांग प्राप्त नहीं कर पा रही थी। उसका कोई चित्र भी पुलिस के पास नहीं था। इस दौरान मायावती पहले भी तीन बार उत्तर प्रदेश के सिंहासन को सुशोभित कर चुकी थीं। परन्तु उस समय ददुआ को मारने का ख्याल मायावती सरकार को नहीं आया।

              आज ददुआ के राजनैतिक समीकरण बदल चुके थे। वह अपनी जान बचाने के लिए उत्तर प्रदेश की पिछली सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी के संरक्षण में चला गया था। यहां तक कि ददुआ का बेटा समाजवादी पार्टी की मदद से ही ंजिला परिषद का अध्यक्ष बन गया था। इतना ही नहीं बल्कि समाजवादी पार्टी ने ददुआ के भाई को प्रतापगढ़ ंजिले से विधानसभा के चुनावों में अपनी पार्टी का उम्मीदवार भी बनाया था। ंजाहिर है ददुआ का राजनैतिक दल-बदल बसपा सुप्रीमो को अच्छा नहीं लगा तथा इस बार सत्ता में आते ही उन्होंने ददुआ से मुठभेड़ करने हेतु उत्तर प्रदेश पुलिस को हरी झण्डी दिखा दी। अब तक सरकार ददुआ गिरोह पर नियंत्रण पाने हेतु 100 करोड़ से भी अधिक ंखर्च कर चुकी थी।

              बेशक ददुआ के मारे जाने के बाद बुंदेलखंड क्षेत्र में आतंक का एक अध्याय समाप्त हो गया है तथा ददुआ से प्रभावित तेंदुए के जंगलों में आने वाले बीड़ी के पत्तों के व्यापारियों से लेकर पन्ना में आने वाले हीरा व्यापारियों तक ने राहत की सांस ली है। परन्तु ददुआ की मुठभेड़ ने यह बहस जरूर छेड़ दी है कि आंखिर राजनेताओं की नंजर में या मायावती जैसे प्रदेश शासकों की नंजर में कोई अपराधी वास्तविक अपराधी कब कहा जाएगा। यदि यही ददुआ हाथी पर वोट न डालने वालों की छाती में गोली मारने का नारा बुलंद करता था, उस समय तो वह मायावती को उनका होनहार पार्टी कार्यकर्ता नंजर आ रहा होगा। परन्तु वही व्यक्ति जब अपनी जान बचाने के लिए समाजवादी पार्टी के संरक्षण में चला गया तो वह 5 लाख का इनामी डाकू ही नहीं बन गया बल्कि सत्ता में आते ही उसके विरुद्ध विशेष अभियान चलाना भी मायावती की मजबूरी बन गई?

              वास्तव में इन दिनों देश में बदले की राजनीति का एक घातक दौर शुरु हो गया है। कई प्रान्तों में यह देखा जा रहा है कि सत्ता संभालने वाला नया सत्ताधीश बिदा होने वाले सत्ताधीश के विरुद्ध जमकर बदले की कार्रवाई कर रहा है। इस सिलसिले में सरकारी तंत्रों विशेषकर पुलिस विभाग का भरपूर प्रयोग किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में यही रविश पुलिस मुठभेड़ व हत्या तक आ पहुंची है। फिलहाल तो सुखद यह है कि ददुआ जैसे ईनामी डाकू को पुलिस का निशाना बनना पड़ा। राजनैतिक प्रतिद्वन्दिता के चलते ही सही परन्तु पूरे देश से ऐसे डाकुओं का संफाया हो जाना चाहिए चाहे वे किसी भी राजनैतिक दल का संरक्षण क्यों न प्राप्त कर रहे हों। परन्तु इसमें पारदर्शिता अवश्य होनी चाहिए। मायावती ने ददुआ को मारकर बेशक बहुत बड़ी सफलता प्राप्त की है परन्तु वे इस आरोप से स्वयं को बचा नहीं सकतीं कि उन्होंने ददुआ को उस समय मरवाया जबकि वह समाजवादी पार्टी को समर्थन दे रहा था। कितना अच्छा होता कि मायावती ने अपने इसके पहले के मुख्यमंत्रित्वकाल में इस गिरोह का उस समय संफाया कराया होता जबकि वह बसपा का झण्डा बुलंद कर रहा था। शायद उस समय मायावती की प्रतिष्ठा में और अधिक चार चांद लगता तथा जनता को यह समझने में कोई दिक्कत न होती कि वास्तव में मायावती ने अपराधियों के संफाए का संकल्प ले रखा है।

 

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