प्रधानमंत्री ने लोकमान्य तिलक पर स्मारक सिक्के जारी किए

प्रधानमंत्री ने लोकमान्य तिलक पर स्मारक सिक्के जारी किए

       प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने लोकमान्य तिलक की 151वीं जयंती के अवसर पर कल यहां स्मारक सिक्कों का एक सैट जारी किया । इस अवसर पर प्रधानमंत्री के संबोधन का मूल पाठ इस प्रकार है -

 

       स्वराज मेरा जन्मसिध्द अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा, अपने इस रोमांचित कर देने वाले नारे से लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने भारतीय जनमानस को झकझोर  कर रख दिया और आजादी की लड़ाई में नई जान फूंक दी । भारत की आजादी की पहली लड़ाई से केवल एक साल पहले यानि 1856 में  लोकमान्य का जन्म हुआ था । लोकमान्य तिलक ऐसे भारत में बड़े हुए जो 1857 के विद्रोह की असफलता के बाद हताशा और निराशा के भंवर में झूल रहा था ।

 

      कुछ लोगों ने जहां आशा छोड़ दी थी, वहीं कुछ लोगों ने यह मानना शुरू कर दिया था कि ब्रिटिश शासन ने एक नई राह पकड़ी है और अब वह अच्छे काम करेगा । यह नजरिया भी जोर पकड़ता जा रहा था कि भारत के लोग अभी आजादी के लिए तैयार नहीं है क्योंकि उन्हें शासन करना नहीं आता । ब्रिटिश साम्राज्य से माफी मांगने वाले लोगों की दलील थी कि औपनिवेशिक प्रशासन में सुधारों से भारतीय को अच्छी सरकार मिलने जा रही है ।

 

      हताशा और निराशावाद के इस माहौल में लोकतान्य तिलक ने दृढता से कहा कि तथाकथित अच्छा प्रशासन स्वशासन का पर्याय नहीं है । भारत के लोग खुद पर शासन करने का अपना स्वाभाविक अधिकार चाहते हैं । इसलिए उन्होंने कहा कि स्वराज हमारा जन्मसिध्द अधिकार है। हर व्यक्ति को जन्म के साथ ही स्वतंत्रता का अधिकार मिला है । इसलिए हमें आजादी भीख में नहीं चाहिए । उनके इस कथन ने अलग-अलग प्रांतों के अलग-अलग भाषाभाषी और अलग-अलग धर्मों को मानने वाले लोगों को एकजुट करने में काफी प्रभाव डाला ।

 

      मुझे इस बात की काफी खुशी है कि हमारी सरकार आज उनकी जयंती के अवसर पर स्मारक सिक्कों के इस सैट से लोकमान्य तिलक का सम्मान कर रही है । मैं इस अविस्मरणीय अवसर से जुड़कर अपने आप को अत्यंत सम्मानित महसूस कर रहा हूं ।

 

      लोकमान्य तिलक हमारे अत्यंत सम्मानित स्वतंत्रता सेनानियों में से एक हैं । देश के अंदर और देश के बाहर के लोगों में उनका प्रभाव निश्चय ही मंत्रमुग्ध कर देनेवाला था । ब्रिटिश अधिकारियों ने 1908 में जब उन्हें गिरपऊतार किया तो लेनिन जैसी दुनिया की जानी-मानी हस्ती ने भी इसकी निंदा की । लोकमान्य तिलक को गिरपऊतार करने पर उन्होंने ब्रिटिश प्रशासन की जबर्दस्त भर्त्सना की । महात्मा गांधी द्वारा हमारी आजादी के संघर्ष का नेतृत्व करने से पहले, यह लोकमान्य तिलक ही थे जिन्होंने पथ-प्रदर्शक की भूमिका निभाई ।

 

      तिलक का तुमुलनाद देश के लोगों के लिए एक ताजी हवा के झोंके की तरह आया और उसने लगभग हार मान चुके राष्ट्र को फिर से जगा दिया । उनके इस तुमुलनाद ने लोगों के दिलों में अप्रत्याशित ऊर्जा और साहस भर दिया तथा लोगों को ब्रिटिश शासन की ताकत के खिलाफ खड़ा होने को प्रेरित किया । महात्मा गांधी ने लोकमान्य तिलक को अपना सबसे मजबूत कवच बताया । पंडित जवाहर लाल नेहरू, जो उस समय लंदन में अध्ययन कर रहे थे,ने अपने आप को तिलकवादी बताया ।

 

      तिलक ने जिस स्वराज को प्राप्त करने की परिकल्पना की थी उसका तात्पर्य  विदेशी शासन और देश की शोषणवादी सामाजिक परम्पराओं दोनों से हमें मुक्त कराना था । राष्ट्रीय आंदोलन में समाज के सभी लोगों को शामिल करके वे आंदोलन और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस दोनों के आधार को व्यापक बनाना चाहते थे । आम आदमी को आंदोलित करके स्वराज प्राप्त करने की उनकी इच्छा और दृष्टिकोण हमारी आजादी के संघर्ष में एक नया मोड़ साबित हुआ । सुश्री ऐनी बेसेंट के साथ मिलकर उन्होंने होम रूल आंदोलन शुरू किया । और इस आंदोलन ने ब्रिटिश सरकार को यह मानने के लिए मजबूर कर दिया कि जवाबदेह सरकार कायम करना उनका अंतिम लक्ष्य है। उनकी सक्रियता और प्रचार माध्यमों के जरिए आजादी के आह्वान ने देश की संपूर्ण पीढी क़ो प्रेरित किया ।

 

      लोकमान्य तिलक की स्वराज की अवधारणा सर्वनिहित थी । इसमें हिंदुओं तथा अन्य धर्मों को मानने वालों के लिए बराबर की जगह थी । लोकमान्य तिलक हिंदू मुस्लिम एकता के प्रबल समर्थक थे । उन्होंने अपने पत्र केसरी में लिखा था  न्नजब हिन्दू और मुस्लिम एकजुट होकर एक साझा मंच से स्वराज की मांग करेंगे तब ब्रिटिश प्रशासन को यह महसूस करना ही होगा कि उनके दिन अब गिने चुने रह गए हैं । न्न तिलक एक समर्पित हिन्दू बने रहने और दुनिया के बारे में धर्मनिरपेक्ष नजरिया रखने के बीच कोई विरोधाभास नहीं मानते थे । उनका यह नजरिया आधुनिकवाद और उनके प्रबुध्द विचारों को दर्शाता है ।

 

      इसलिए, लोकमान्य तिलक ने लोगों में राष्ट्रवाद की भावना को बढावा देने के लिए जब गणेश उत्सव का उपयोग किया, तब इसका तात्पर्य यह नहीं था कि वे एक कटरपंथी या साम्प्रदायिक थे । वे धार्मिक तथा राष्ट्रवादी दोनों ही थे । राष्ट्र निर्माण और सामाजिक एकजुटता के व्यापक हित में धार्मिक उत्सव का यह एक सृजनशील उपयोग था । आजादी की पहली लड़ाई के बाद, ब्रिटिश प्रशासन ने धर्म से संबंधित मामलों में दखल न करने का फैसला लिया था । लोकमान्य तिलक ने इस नीति का फायदा उठाया और औपनिवेशिक शासन से मुक्त होने के लिए लोगों को राजनीतिक और धर्मनिरपेक्षता के आधार पर एकजुट करने के उद्देश्य से उन्होंने गणेश उत्सव और शिवाजी जयंती का इस्तेमाल किया । लोकमान्य ने लोगों को एकजुट करने न कि उनमें दरार डालने के लिए धर्म का इस्तेमाल किया। उन्होंने आजादी पाने न कि नफरत फैलाने के लिए धर्म का इस्तेमाल किया। जो लोग, लोगों को विभाजित करने और नफरत फैलाने के लिए धर्म का इस्तेमाल करते हैं, उन्हें लोकमान्य तिलक के जीवन और कार्यों से सकारात्मक सबक लेना चाहिए ।

 

      यहां यह भी स्मरणीय है कि लोकमान्य तिलक जैसे सामाजिक और राजनीतिक नेताओं ने महिला पुरूष समानता और महिलाओं के अधिकारों पर सबसे ज्यादा बल दिया । इसीलिए महाराष्ट्र के लोग, स्त्री और पुरूष दोनों ही हमारे देश में महिलाओं के उत्कर्ष और सशक्तीकरण में सबसे आगे हैं । इसलिए, लोकमान्य तिलक की जयंती के अवसर पर आज हम गर्व से कह सकते हैं कि भारत की पहली महिला राष्ट्रपति भी महाराष्ट्रियन है । मुझे पूरा  विश्वास है कि लोकमान्य तिलक को भी आज अत्यंत प्रसन्नता हुई होती ।

 

      इस वर्ष हम आजादी के 60वीं वर्षगांठ, आजादी की पहली लड़ाई की 150वीं वर्षगांठ और लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की 151वीं जयंती मना रहे हैं । मुझे एक भारतीय होने के नाते इस बात पर गर्व है कि हमारे राष्ट्रपति के रूप में  तिलक के गृह स्थान से एक महिला होगी ।

 

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